11

May
2018

बातकेवल गलियों कीनहीं

Posted By : admin/ 201 0

बातकेवल गलियों कीनहीं है, न केवल मंदिरों कीऔर न ही केवल घाटों की | सचकहूँ …..ये सारा शहर हीबाहों में बाहें डालकर चल देता है …गरल सखी की तरह | साथ में दौड़ता है, लड़खड़ता है, हँसता है, रोता है औरकभी-कभी मजे भी ले लेता है फिर उस बनारसी गाली के साथ पान में सने पीले दांत चियार देता है | मुझे आज भी याद है स्टेशन पर पहले दिन का उतरना | एकऊटपटांग सा शहर आपका स्वागत करता है | इस स्वागत में साराबनारससिमटआताहै | चीर-हरण जैसे शब्द तो यहाँ है ही नहीं पर इस शहर में क़दम रखते ही आपका बुद्धि-हरण प्रारंभ हो जाता और कुछ दिन के बाद बौद्धिक होते हुए भी आप बौद्धिक नहीं बनरसिया हो जाते है | शरीरकी एक-एक नश इस शहर की एक-एक गली पर बिछ जाती है| अब आप फर्क खोजते है अपने में और शहर में…..गलियोंमें, मंदिरोंमें, घाटोंमें| ….बहुत कठिन होता है ये फर्क खोजना और यहाँ से अलग होना | मुझे आज भी याद है वहाँ की आखिरी ट्रेन | ट्रेन धीरे-धीरे चलती है | आज फिर सारा शहर सिमटता है …..एस बार स्वागत में नहीं विदाई में | खिड़की से मुझे…दिखता है… ये सारा शहर बाहें फैलता है ….गरल सखी की तरह….. खिड़की पकड़ के दौड़ता है,लड़खड़ता है, हँसनाभीचाहता है औरफिर घुटनों पर टूटकर रोताहै | मैं अभी तक खिड़की से देख रहा हूँ कि शायदएक बार फिरउस बनारसी गाली के साथ पान में सने पीले दांत चियार दे !

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